international men’s day हा मै पुरुष हु

हाँ….. हाँ समुद्र हूँ मैं….
असीम गहराइयों से भरा,तुम्हारी समझ से परे
तुम्हें लगता हूँ मैं, निष्ठुर, भयानक और अड़ियल….
हाँ हूँ मैं….
हूँ मैं ख़ार से भरा…
पर अविरल इतना ख़ार उगलने को,
मैंने निगला भी होगा इससे कहीं अधिक खारा
पर तुम यह सब नहीं समझ पाओगी,
क्योंकि तुम खड़ी हो मेरे किनारे पर,
समझना है जो मुझे, तो डूबो मुझमें….
मेरी गहराइयों में…तल तक…..अनंत तक…
क्या हुआ ….डर गयीं??
वो अनेक जीव और जीवन संभावनाएं,
जो हैं समाहित मुझमें, वही सिर्फ समझतीं हैं मुझे…..
पर वो बोल नहीं सकतीं….
तुमसे नहीं होगा, तुम नहीं समझ पाओगी कभी, क्योंकि मैं समझा ही नहीं जा सकता खड़े रहकर किनारे से….
फ़िर तुम तो मेरे किनारे खड़ी रहने से भी डरती हो,
की कहीं लील न जाऊं तुम्हें मैं…
मैं नहीं लीलता किसी को भी, हर प्रयास करता हूँ तुम्हें फेंकने का वापस तुम्हारी दुनिया में, पर एक दफ़ा खो कर मुझमें, तुम ही वापसी की चाह नहीं रख पातीं….
पर यह निर्णय तुम्हारा है, मेरा नहीं….
मैं कभी बदला ही नहीं तुम्हें पाने को,
बदलाव तो तुम्हारी दृष्टि में है…..
मैं वैसा ही हूँ, हमेशा से…..
गहरा…..भयानक……खारा……
हाँ मैं समुद्र हूँ……
मैं पुरुष हूँ…….

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कैसा था श्रीकृष्ण और राधा का प्रेम

एक पौराणिक गाथा काफी प्रसिद्ध है जो हमें श्रीकृष्ण एवं राधाजी के अटूट प्रेम की याद दिलाती है। कहते हैं कि एक बार नंदलाल काफी बीमार पड़ गए। कोई दवा या जड़ी-बूटी उन पर बेअसर साबित हो रही थी। तभी श्रीकृष्ण ने स्वयं ही गोपियों से एक ऐसा उपाय करने को कहा जिसे सुन गोपियां दुविधा में पड़ गईं।
दरअसल श्रीकृष्ण ने गोपियों से उन्हें चरणामृत पिलाने को कहा। उनका मानना था कि उनके परम भक्त या फिर जो उनसे अति प्रेम करता है तथा उनकी चिंता करता है यदि उसके पांव को धोने के लिए इस्तेमाल हुए जल को वे ग्रहण कर लें तो वे निश्चित ही ठीक हो जाएंगे।
लेकिन दूसरी ओर गोपियां और भी चिंता में पड़ गईं। श्रीकृष्ण उन सभी गोपियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण थे, वे सभी उनकी परम भक्त थीं लेकिन उन्हें इस उपाय के निष्फल होने की चिंता सता रही थी।
उनके मन में बार-बार यह आ रहा था कि यदि उनमें से किसी एक गोपी ने अपने पांव के इस्तेमाल से चरणामृत बना लिया और कृष्णजी को पीने के लिए दिया तो वह परम भक्त का कार्य तो कर देगी। परन्तु किन्हीं कारणों से कान्हा ठीक ना हुए तो उसे नर्क भोगना पड़ेगा।
अब सभी गोपियां व्याकुल होकर श्रीकृष्ण की ओर ताक रहीं थी और किसी अन्य उपाय के बारे में सोच ही रहीं थी कि वहां कृष्ण की प्रिय राधा आ गईं। अपने कृष्ण को इस हालत में देख के राधा के तो जैसे प्राण ही निकल गए हों।
जब गोपियों ने कृष्ण द्वारा बताया गया उपाय राधा को बताया तो राधा ने एक क्षण भी व्यर्थ करना उचित ना समझा और जल्द ही स्वयं के पांव धोकर चरणामृत तैयार कर श्रीकृष्ण को पिलाने के लिए आगे बढ़ी।
राधा जानतीं थी कि वे क्या कर रही हैं। जो बात अन्य गोपियों के लिए भय का कारण थी ठीक वही भय राधा को भी मन में था लेकिन कृष्ण को वापस स्वस्थ करने के लिए वह नर्क में चले जाने को भी तैयार थीं।
आखिरकार कान्हा ने चरणामृत ग्रहण किया और देखते ही देखते वे ठीक हो गए। क्योंकि वह राधा ही थीं जिनके प्यार एवं सच्ची निष्ठा से कृष्णजी तुरंत स्वस्थ हो गए। अपने कृष्ण को निरोग देखने के लिए राधाजी ने एक बार भी स्वयं के भविष्य की चिंता ना की और वही किया जो उनका धर्म था।

धर्म और धार्मिक कट्टरता – भाग १/२

           तार्किकता के पैरोकार, अक्सर धार्मिक कट्टरता के लिए धर्म को दोषी ठहराते हैं. क्या यह सोच सही है? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए सबसे पहले हमें धार्मिक कट्टरता का अर्थ समझना होगा. सामान्य भाषा में हम यह कह सकते हैं कि कट्टर वह व्यक्ति है जिसने अपने दिमाग़ के खिड़की-दरवाजे बंद कर रखे हैं, जो किसी तर्क को सुनना या समझना ही नहीं चाहता. वह किसी नए विचार को ग्रहण करने के बजाय, पिटी-पिटाई लीक पर चलता रहता है. उसकी मान्यताओं-विश्वासों  का खंडन करने वाले चाहे जितने तर्क दें, वह अपनी बात पर अड़ा रहता है. स्पष्टत:, कट्टरता का संबंध व्यक्ति की मानसिकता से है जबकि धर्म का ताल्लुक आध्यात्मिकता व नैतिकता से है.

         आस्था और कट्टरता के बीच विभेद करना भी आवश्यक है. आस्था वह है जिस पर व्यक्ति पूरी दृढ़ता से विश्वास करता है. दृढ़ विश्वास के बिना आस्था का कोई अर्थ नहीं है. यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आस्था और कट्टरता में क्या अंतर है. आस्था और कट्टरता में ज़मीन-आसमान का फर्क़ है. आस्था वह मान्यता है, जिस पर कोई व्यक्ति पूरी दृढ़ता से विश्वास करता है परंतु आस्था, तार्किकता पर आधारित होती है. आस्था से व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति होती है, उसे आंतरिक शांति मिलती है. इसके विपरीत कट्टरता, अंधश्रद्धा पर आधारित होती है. कट्टरता से बौद्धिक विकास बाधित होता है.

          आस्था व्यक्ति को आत्मविश्वास देती है. कट्टर व्यक्ति अपने नेता का बौद्धिक गुलाम होता है. अरबी में धार्मिक आस्था के लिए ईमान शब्द प्रयुक्त होता है, जिसका अर्थ है वह जो आदमी को सुरक्षा का भाव दे. कट्टर व्यक्ति स्वयं को असुरक्षित महसूस करता है और इसलिए वह कोई तर्क सुनना ही नहीं चाहता. जिस व्यक्ति में असुरक्षा का भाव और आत्मविश्वास की कमी जितनी अधिक होती है, वह व्यक्ति उतना ही कट्टर होता है. आस्थावान व्यक्ति, ज्ञानी व परिपक्व होता है जबकि कट्टर व्यक्ति, अज्ञानी व अपरिपक्व.

         मैं आस्था और कट्टरता के बीच के अंतर पर इतना जोर इसलिए दे रहा हूं क्योंकि इन दिनों धार्मिक कट्टरता से प्रेरित कई हिंसक घटनाएं हो रही हैं. इनमें से सबसे ताजी घटना है तौहीन-ए-रिसालत क़ानून की ख़िला़फत करने वाले पंजाब (पाकिस्तान) के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या. इसमें कोई दो मत नहीं कि तासीर का हत्यारा धार्मिक व्यक्ति नहीं था. वह तो एक कट्टर शख्स था.

         कोई भी सच्चा धार्मिक व्यक्ति किसी की हत्या नहीं कर सकता. विशेषकर तब, जबकि उसका शिकार जिस क़ानून का विरोध कर रहा था, वह कोई दैवीय क़ानून नहीं था. वह तो पाकिस्तान की संसद द्वारा बनाया गया एक साधारण क़ानून था, जिसके निर्माण के पीछे धार्मिक नहीं बल्कि राजनैतिक उद्देश्य थे. जब पाकिस्तान के सैनिक तानाशाह जिया-उल-हक को लगा कि उनका सिंहासन डोल रहा है, तब उलेमा के एक तबके का समर्थन हासिल करने के लिए उन्होंने यह क़ानून बना दिया. यह समझना महत्वपूर्ण है कि कुटिल राजनेता अक्सर धार्मिक कट्टरता का इस्तेमाल अपने हितसाधन के लिए करते हैं और पाकिस्तान में तानाशाहों के अलावा वहां के कथित उदारवादी व प्रजातांत्रिक नेताओं ने भी यही किया है.

         यहां यह कहना अप्रासंगिक न होगा कि कट्टरपंथियों का भी हृदय परिवर्तन किया जा सकता है, बशर्ते उनसे प्रेमपूर्ण व्यवहार किया जाए, उनके दृष्टिकोण को समझा जाए और उन्हें सच्चा ज्ञान दिया जाए. इस सिलसिले में स्वामी असीमानंद का उदाहरण हमारे सामने है. स्वामी असीमानंद एक हिन्दू कट्टरपंथी हैं. उनके साथ जेल में एक मुस्लिम युवक भी था, जो मक्का मस्जिद बम धमाके का आरोपी था. अब्दुल कलीम नामक इस मुस्लिम युवक ने स्वामी असीमानंद की भरपूर सेवा की. वह उनके लिए पानी और खाना लाता था और अन्य तरीक़ों से उनकी मदद करता था. यह इसके बावजूद कि उसे यह मालूम था कि असीमानंद की ऐसे अनेक विस्फोटों में भूमिका थी, जिनमें मुस्लिम मारे गए थे.

          अब्दुल ने स्वामी को यह भी बताया कि उसे पुलिस के हाथों क्या-क्या शारीरिक यंत्रणाएं झेलनी पड़ीं. अब्दुल की निस्वार्थ सेवा से असीमानंद बहुत प्रभावित हुए. उन्हें अपने किए पर बहुत पछतावा हुआ. उन्हें लगा कि एक ओर वे हैं, जिनके कारण निर्दोष अब्दुल को घोर यंत्रणाएं झेलनी पड़ीं और दूसरी ओर अब्दुल है, जो सब कुछ जानते हुए भी उनकी सेवा कर रहा है. उन्हें महसूस हुआ कि अगर उन्होंने अपने गुनाह कुबूल नहीं किए तो अब्दुल जैसे कई मुस्लिम युवकों का जीवन बर्बाद हो जाएगा. असीमानंद ने अब्दुल से पैगंबर मोहम्मद और इस्लाम के बारे में कई प्रश्न पूछे. अब्दुल ने उन्हें बताया कि पैगंबर साहब कितने विनम्र थे और किस प्रकार वे अपने शत्रुओं को भी माफ कर दिया करते थे. इसका भी स्वामी पर गहरा प्रभाव पड़ा और उन्होंने निश्चय किया कि वे अपने अपराध स्वीकार कर लेंगे, फिर चाहे इसके लिए उन्हें मौत की सज़ा ही क्यों न भुगतनी पड़े.

“સંબંધ”

સ્ત્રી અને પુરુષ બંને જતું કરે ત્યારે એક સુંદર સંબંધ સર્જાય છે. સંબંધ ની સુંદરતા સાથે રહીને ચાલવામાં છે. એકબીજાને નીચા દેખાડવામાં નથી. એકબીજા માટે જતું કર્યું તેની ગણતરી કરવાથી  ક્યારેય પણ  સંબંધ ટકતો નથી. જેમ સિક્કાની બે બાજુ હોય છે. એમ જ બંને પાત્રની લાગણીઓ,વિચારસરણી ઓ પણ અલગ હોય છે. સમજણ, સહજતા અને  ધીરજ આ બાબતો જરૂરી છે કોઈપણ સંબંધમાં. પુરુષનો ત્યાગ સ્ત્રીના ત્યાગ જેટલો જ મહત્વનો છે. સંબંધ માં અપેક્ષા, માન-સનમાન અને લાગણીઓની ભૂખ હોયછે. જે સંબંધ સ્વાર્થ અને પૈસા ની જરૂરત પર ટકેલો હોય એ ક્ષણભંગુર માત્ર છે. Couple Kiss Silhouette Hearts

મને લોકો પૂછે છે કે હું કેમ હંમેશા સ્ત્રી – પુરૂષ પર  જ વધારે લખવુ પસંદ કરું છું ? હું એટલું જ કહીશ કે આપણો જન્મ પણ એક સુંદર સંબંધ ના અસ્તિત્વમા આવવાના લીધે થયો છે. જે માણસ સંબંધથી સુખી એ માણસ સદા સુખી. જે માણસ સંબધથી દુઃખી તે માણસ ક્યાંય સુખી નથી. કોઈપણ સંબંધ  હમેશ બે વ્યક્તિઓથી હોય છે. એકલતાનો કોઈ સગો-સંબંધી નથી. બે વ્યક્તિ મળે ત્યારે તેમની લાગણીઓ, અપેક્ષાઓ, વિચારો બમણા થતાં હોય છે કારણકે તેમને આ બધું એક કરવાનું હોય છે. એટલે જ સંબંધો મા તકરાર, દરાર આવતી હોય છે અને જો આવા સમયે સ્ત્રી એની હઠ અને પુરુષ એનો અહમ પકડી રાખે તો ફક્ત એટલું જ કહેવા પૂરતું  રહે કે “વીનાશ કાળે વિપરીત બુદ્ધિ.” એકબીજાની ખામીઓ, ભૂલોને સુધારવી, સમજવી, સ્વીકારવી એ  એક માત્ર યોગ્ય વિકલ્પ છે. જે સંબંધ માં બે વ્યક્તિઓ એક ના થાય એને સંબંધ ના  કહી શકાય.

સંબંધનો સીધો સંબંધ અપેક્ષા સાથે જોડાયેલ છે. જયારે વ્યક્તિઓની અપેક્ષાને ઠેસ, અથવા તેમની અપેક્ષા પૂર્ણ નથી તયારે સંબંધમા તિરાડ પડે છે. એ જ રીતે જ્યારે બે વ્યક્તિ વચ્ચે કમ્યુનિકેશન ગેપ એટલે કે સંચાર,   સંદેશવ્યવહાર અને સાદી ભાષામાં કહ્યે તો બેસી ને વાત-ચીત ન કરવી અને  સમસ્યાઓને મુક્તપણે જણાવે નહીં તયારે આવી પરિસ્થિતિ ઉત્પન્ન થતી હોય છે. આવી પરિસ્થિતઓમાં પણ સંબંધ ને  સંકેલવા પડે છે. આના સિવાય પણ અન્ય પરિબળો છે જેના લીધે સંબધનો અંત  અણવો પડતો હોય છે.

એક વ્યક્તિની સમજણ, ત્યાગ કે પછી સહન કરવાથી ક્યારેય સમસ્યાનું સમાધાન નથી થતું. બંને વ્યકિતએ આ તમામ પરિબળો હંમેશા સમાન અને સરખે ભાગે આવે ત્યારે જ સંબંધ પૂર્ણ થયો ગણાય.

અનેક ભાષા-પરિભાષા માં સંબંધ ની વ્યાખ્યાઓ લખવામાં આવી છે પણ હું તમને ખાત્રી આપું છુ કે બધા સહમત થાય એવી સંબંધ ની એક પણ  વ્યાખ્યા આ જગતમાં લખાઈ નથી. મેં સોસીયલ મિડિયા પર  અનેક પોસ્ટ શેર કરી છે અને  અનેક પોસ્ટ વાંચી છે પણ પરફેટ તો કોઈ લખી શક્યું નથી આ નાના અમસ્થા “સંબંધ” શબ્દ વિશે અને હું પણ કદાચ આ શબ્દ પર પરફેક્ટ લખી શકી એમ કહેવું યોગ્ય નથી.

અંતમાં એટલું જ  કહીશ  કે જેમ લાગણીઓ બદલાય એની સાથે જ “સંબંધ”ની વ્યાખ્યા પણ  બદલાય જાય છે.મારા  અવલોકન પ્રમાણે  હું એટલું જ કહીશ કે “સંબંધ” એટલે “સમય” કદાચ મારી આ વાત સાથે તમે પણ સહમત થશો.

~ Credit To Kiran Mahesh